मई 2026 के शुरुआती दिनों में मध्य पूर्व (Middle East) एक बार फिर बारूद के ढेर पर खड़ा नजर आ रहा है। अमेरिका और इसराइल द्वारा ईरान के सैन्य ठिकानों को निशाना बनाए जाने के बाद पूरी दुनिया की नजरें इस क्षेत्र पर टिकी हैं। यह केवल दो देशों के बीच का संघर्ष नहीं, बल्कि एक ऐसा घटनाक्रम है जो वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के बुनियादी ढांचे को हिलाने की क्षमता रखता है। ईरान और इसराइल के बीच का ‘प्रॉक्सी वॉर’ (छद्म युद्ध) अब सीधे टकराव में बदल चुका है। रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के परमाणु कार्यक्रम की बढ़ती गति और क्षेत्रीय मिलिशिया समूहों को उसके कथित समर्थन ने अमेरिका और इसराइल को इस आक्रामक कदम के लिए मजबूर किया। रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि यह हमला ईरान की प्रतिरोधक क्षमता (deterrence) को तोड़ने और उसे वार्ता की मेज पर कमज़ोर स्थिति में लाने का एक प्रयास है। इस हमले के बाद अंतरराष्ट्रीय बिरादरी दो धड़ों में बंटती दिख रही है: पश्चिमी गुट: अमेरिका और उसके सहयोगी इस हमले को आत्मरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक बता रहे हैं। रूस और चीन का रुख: दूसरी ओर, रूस और चीन ने इस कार्रवाई की कड़ी निंदा करते हुए इसे अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता का उल्लंघन बताया है। भारत की भूमिका: भारत के लिए यह स्थिति बेहद नाजुक है। एक तरफ अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी है, तो दूसरी तरफ ईरान के साथ चाबहार बंदरगाह और ऊर्जा संबंधी पुराने संबंध। भारत शांति और कूटनीतिक बातचीत के जरिए समाधान निकालने की अपील कर रहा है। ईरान पर हमलों की खबर फैलते ही वैश्विक तेल बाजारों में खलबली मच गई है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz), जो दुनिया के कच्चे तेल की आपूर्ति का एक मुख्य मार्ग है, पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं। यदि ईरान इस मार्ग को बाधित करता है, तो दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल की कीमतों में भारी उछाल आ सकता है, जिससे विकासशील देशों की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ेगा। युद्ध हमेशा अपने साथ मानवीय त्रासदी लाता है। ईरान के प्रमुख शहरों में अफरा-तफरी का माहौल है, जबकि पड़ोसी देशों में शरणार्थी संकट की आशंका बढ़ गई है। साइबर हमलों और ड्रोन वॉरफेयर के इस दौर में, आम जनता सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कर रही है। ईरान पर हुए ये हमले यह स्पष्ट करते हैं कि 21वीं सदी में कूटनीति की असफलता कितनी महंगी पड़ सकती है। यदि तनाव को समय रहते कम नहीं किया गया, तो यह स्थानीय संघर्ष एक ‘महायुद्ध’ का रूप ले सकता है। वर्तमान में दुनिया को संयम, संवाद और एक मजबूत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की आवश्यकता है ताकि इस बारूद की गंध को शांति की खुशबू में बदला जा सके।