देहरादून। भारतीय प्रबंधन संस्थान, आईआईएम काशीपुर में हिंदी माह 2026 का औपचारिक समापन समारोह अत्यंत गरिमामय वातावरण में आयोजित किया गया। महीने भर चली विभिन्न साहित्यिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के समापन अवसर पर हिंदी भाषा व साहित्य की समकालीन प्रासंगिकता पर विचार-विमर्श हुआ। इस दौरान प्रतियोगिता के विजेताओं को पुरस्कृत किया गया तथा संस्थान की प्रतिष्ठित वार्षिक हिंदी पत्रिका जलाश्म का अनावरण भी किया गया। समारोह की अध्यक्षता आईआईएम काशीपुर के निदेशक प्रो. नीरज द्विवेदी ने की। कार्यक्रम में गोविंद बल्लभ पंत कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय पंतनगर के कुलपति प्रो. शिवेंद्र कुमार कश्यप मुख्य अतिथि तथा प्रख्यात शिक्षाविद् एवं लेखक प्रो. रामेश्वर राय विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित रहे।
महीने भर आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं के उत्कृष्ट प्रतिभागियों को अतिथियों द्वारा पुरस्कार और प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया। निबंध लेखन में मनीष कुमार शर्मा (प्रथम स्थान), पत्र लेखन में शरद कुमार श्रीवास्तव (प्रथम स्थान), कविता लेखन में सौरभ पाठक (प्रथम स्थान) एवं ऑनलाइन सामान्य ज्ञान में शुभम कुमार (प्रथम स्थान) पर रहे।
इसके अतिरिक्त, पूर्व में आयोजित आशुभाषण प्रतियोगिता के परिणामों की घोषणा भी समारोह के दौरान की गई, जिसमें 16 विद्यालयों के 27 विद्यार्थियों ने अपनी वक्तृत्व कला का प्रदर्शन किया था। कार्यक्रम के प्रमुख आकर्षणों में आईआईएम काशीपुर की वार्षिक हिंदी पत्रिका ‘जलाश्म’ का अनावरण शामिल रहा। इस पत्रिका के नामकरण में अतुल कुमार श्रीवास्तव का विशेष योगदान रहा।
प्रो. शिवेंद्र कुमार कश्यप (मुख्य अतिथि) ने  मातृभाषा के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि व्यक्ति के मूल विचार और मौलिक सपने स्वाभाविक रूप से उसकी अपनी भाषा में ही आकार लेते हैं। उन्होंने दैनिक जीवन में हिंदी के घटते प्रयोग पर चिंता जताते हुए भाषा संरक्षण के सचेत प्रयासों पर बल दिया। साथ ही, उन्होंने पंतनगर विश्वविद्यालय की प्ब्।त् रैंकिंग और सामुदायिक रेडियो की उपलब्धियों को साझा किया।
प्रो. रामेश्वर राय (विशिष्ट अतिथि) ने ‘समकालीन संदर्भों में हिंदी साहित्य एवं भाषा की भूमिका’ विषय पर व्याख्यान देते हुए प्रो. राय ने 1835 की औपनिवेशिक शिक्षा नीतियों का उल्लेख किया, जिसने स्वदेशी भाषाओं को पीछे धकेला। उन्होंने कहा कि हिंदी मनोरंजन और बाजार की भाषा के रूप में तो मजबूत है, लेकिन गहन दार्शनिक व ज्ञान की भाषा के रूप में इसे और सशक्त करने की आवश्यकता है। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के अनियंत्रित विस्तार, पर्यावरणीय क्षरण और सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ाव जैसे मुद्दों पर आत्मचिंतन का आह्वान किया। प्रो. नीरज द्विवेदी (अध्यक्षीय संबोधन) में निदेशक प्रो. द्विवेदी ने हिंदी के व्यावहारिक और संस्थागत उपयोग पर जोर देते हुए कहा कि आधुनिक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) और अनुवाद तकनीकों ने भाषाई बाधाओं को कम कर दिया है, जिससे पेशेवर कार्यों में हिंदी का प्रयोग अधिक व्यावहारिक हो गया है। उन्होंने संस्थान के सभी सदस्यों से आधिकारिक पत्राचार और दैनिक प्रशासनिक कार्यों में बिना किसी झिझक के स्वाभाविकता और गर्व के साथ हिंदी अपनाने का आह्वान किया।