उत्तराखंड भारतीय जनता पार्टी महिला मोर्चा कि प्रदेश उपाध्यक्ष डॉ भावना डोभाल ने एक प्रेस वार्ता मे नारी शक्ति वंदन अधिनियम के पारित होने के पश्चात मातृत्व कल्याण मे राष्ट्रीय विकास हेतु महिलोओं कि भूमिका पर विचार रखते हुए कहा कि संस्कृति के मूल दर्शन में शक्ति को सृजन और संवर्धन का आधार माना गया है। प्राचीन ऋषियों ने ‘शक्ति’ को केवल एक शब्द नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की संचालित ऊर्जा के रूप में देखा। वेदों और उपनिषदों का यह उद्घोष “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमयंते तत्र देवताः” आज के आधुनिक लोकतंत्र में एक नए और व्यापक अर्थ के साथ पुनर्जीवित हो उठा है। प्राचीन काल में जहाँ नारी को पूजनीय माना गया, वहीं वर्तमान में ‘पूजनीय’ से ‘प्रशासक’ और ‘निर्णायक’ की भूमिका में प्रतिष्ठित करने की भावना को संवैधानिक रूप देने के लिए केंद्र सरकार द्वारा ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ (106वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2023) पारित किया गया। यह अधिनियम केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि सदियों से चली आ रही लैंगिक असमानता को दूर करने का एक दृढ़ संकल्प है। इसके माध्यम से लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया है, जिसमें अनुसूचित जाति और जनजाति की महिलाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित की गई है। यह ऐतिहासिक निर्णय शासन व्यवस्था में महिलाओं की प्रभावी उपस्थिति को अनिवार्य बनाता है, जिससे राष्ट्र के नीति-निर्धारण में उनकी सक्रिय भूमिका सुनिश्चित हो सके।
भारतीय राजनीति के फलक पर महिला प्रतिनिधित्व का ग्राफ निरंतर प्रगतिशील रहा है। वर्ष 1957 में जहाँ चुनाव लड़ने वाली महिलाओं की संख्या मात्र 3 प्रतिशत थी, वहीं 2024 में यह बढ़कर 10 प्रतिशत तक पहुँच गई है। विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी को निरंतर प्रोत्साहन मिला है, जो लोकसभा चुनावों में महिला प्रत्याशियों की बढ़ती संख्या से स्पष्ट होता है। देश ने पहली आदिवासी महिला राष्ट्रपति के रूप में माननीय द्रौपदी मुर्मू जी को गौरवपूर्ण पद पर आसीन होते देखा है, जो सामाजिक न्याय और महिला नेतृत्व का अनुपम उदाहरण है। इसके अतिरिक्त, विदेश मंत्रालय में सुषमा स्वराज जी की संवेदनशीलता और वित्त मंत्रालय में निर्मला सीतारमण जी की कुशलता ने यह सिद्ध कर दिया है कि नारी शक्ति परिवार के प्रतिनिधित्व से लेकर राष्ट्र के कुशल प्रतिनिधित्व करने में सक्षम है।
विगत एक दशक में ‘नारी शक्ति’ को केंद्र में रखकर राष्ट्रीय स्तर में क्रियान्वित की गई विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं ने इस अधिनियम के लिए एक मजबूत सामाजिक और आर्थिक आधार तैयार किया है। ‘स्वच्छ भारत अभियान’ के तहत निर्मित 12 करोड़ से अधिक शौचालयों ने महिलाओं की गरिमा और स्वास्थ्य की रक्षा की है, तो ‘उज्ज्वला योजना’ के 10.7 करोड़ गैस कनेक्शनों ने उन्हें धुएं से मुक्ति दिलाई है। जल जीवन मिशन, प्रधानमंत्री आवास योजना और मुद्रा लोन जैसी पहल ने महिलाओं को आत्मनिर्भर और सशक्त बनाया है। आज देश में 3 करोड़ से अधिक ‘लखपति दीदी’ और करोड़ों जन धन खातों के माध्यम से वित्तीय समावेशन की सफलता इस बात का प्रमाण है कि भारत की नारी अब केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि विकास की सारथी बन चुकी है।
शिक्षा और रक्षा जैसे क्षेत्रों में भी महिलाओं ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराकर पुरानी रूढ़ियों को ध्वस्त किया है। उच्च शिक्षा में छात्राओं का नामांकन 2.18 करोड़ तक पहुँचना एक सुखद संकेत है। वहीं, सशस्त्र बलों में महिलाओं के लिए द्वार खोलना, एनडीए के माध्यम से प्रवेश और युद्धपोतों व फाइटर जेट्स में उनकी तैनाती यह दर्शाती है कि सुरक्षा की कमान अब वीर बेटियों के हाथों में भी सुरक्षित है। मिशन शक्ति और महिला हेल्प डेस्क जैसी व्यवस्थाओं ने उन्हें सुरक्षा का एक कवच प्रदान किया है। अंतरिक्ष विज्ञान में भी चंद्रयान-3 और आदित्य एल-1 जैसे मिशनों का नेतृत्व कर महिला वैज्ञानिकों ने भारत का मस्तक विश्व पटल पर ऊँचा किया है।
ऋग्वेद में कहा गया है— “स्त्री हि ब्रह्मा बभूविथ” अर्थात स्त्री स्वयं ब्रह्म (ज्ञान और शक्ति का स्वरूप) है। इसी आध्यात्मिक सत्य को राजनीतिक धरातल पर उतारते हुए महिलाओं को विधायी निकायों में प्राप्त ३३% आरक्षण केवल सीटों का आवंटन मात्र नहीं है, बल्कि राष्ट्र के निर्माण में एक सकारात्मक सोच को आगे भविष्य में विकासोन्मुखी नीति को समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति तक पहुंचना।

यह अधिनियम वास्तव में सांस्कृतिक जड़ों और भविष्य के स्वप्नों के बीच एक सेतु है। जहाँ एक ओर हम अपनी परंपराओं का सम्मान करते हैं, वहीं दूसरी ओर हम ‘अमृत काल’ के ऐसे भारत का निर्माण कर रहे हैं जहाँ मातृशक्ति के हाथों भविष्य की दूर दृष्टि होगी। नारी शक्ति वंदन अधिनियम उन तमाम राजनीतिक बाधाओं और विरोधों का उत्तर है, जिन्होंने दशकों तक महिला आरक्षण को लटकाए रखा। पूर्व की सरकारों में इच्छाशक्ति के अभाव और राजनीतिक तुष्टिकरण के कारण जो विधेयक बार-बार विफल रहा, उसे वर्तमान नेतृत्व ने ऐतिहासिक बहुमत के साथ पारित कर संवैधानिक वास्तविकता में बदला है। यह अधिनियम ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास’ के मूल मंत्र को चरितार्थ करता है। यह राष्ट्र निर्माण में महिलाओं की न्यायपूर्ण हिस्सेदारी सुनिश्चित करने का महायज्ञ है। अब समय आ गया है कि समाज का प्रत्येक वर्ग इस बदलाव का साक्षी और सहभागी बने, क्योंकि नारी शक्ति का सशक्तीकरण ही वास्तव में राष्ट्र शक्ति का आधार है।